हिरोशिमा में गिर परमाणु बम से भी ज्यादा थी नेपाल बाढ़ की ऊर्जा, हिल गई थी धरती

नेपाल बाढ़ की ऊर्जा हिरोशिमा परमाणु बम से भी ज्यादा? ग्लेशियर टूटने से मची जलप्रलय ने हिला दी धरती

नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, यह केवल भारी बारिश से आई सामान्य बाढ़ नहीं थी, बल्कि ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े पैमाने पर टूटकर नदी में गिरने से पैदा हुए तेज मलबा-प्रवाह ने हालात को बेहद गंभीर बना दिया। विशेषज्ञों के अनुसार, इस घटना से पैदा हुई ऊर्जा इतनी विशाल थी कि इसकी तुलना हिरोशिमा में गिराए गए परमाणु बम की ऊर्जा से की जा रही है।

कैसे शुरू हुई नेपाल की विनाशकारी बाढ़?

रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल की लांगटांग घाटी में लिरुंग चोटी की उत्तरी ढलान पर ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर करीब 1,400 मीटर की ऊंचाई से नीचे गिरा। इसके साथ बर्फ और चट्टानों का भारी मलबा नदी में पहुंचा और देखते ही देखते पानी का विशाल प्रवाह तेज गति से नीचे की ओर बढ़ने लगा।इस मलबे ने नदी के बहाव को और खतरनाक बना दिया। पानी, बर्फ और चट्टानों के इस मिश्रण ने रास्ते में आने वाले इलाकों, सड़कों, पुलों और अन्य ढांचों को भारी नुकसान पहुंचाया।

हिरोशिमा परमाणु बम से क्यों की जा रही है तुलना?

त्रिभुवन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर डिजास्टर स्टडीज के निदेशक बसंत राज अधिकारी के अनुसार, उन्होंने इस घटना में बर्फ और मलबे के नीचे आने से पैदा हुई ऊर्जा का आकलन किया। उनके मुताबिक यह ऊर्जा हिरोशिमा में गिराए गए परमाणु बम से भी अधिक थी। उन्होंने इसे अपने शोध करियर की सबसे बड़ी हिमालयी बाढ़ घटनाओं में से एक बताया।हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। बाढ़ की ऊर्जा और परमाणु विस्फोट की ऊर्जा की यह तुलना सीधे तौर पर विस्फोटक शक्ति की तुलना नहीं है। एक अन्य विशेषज्ञ के प्रारंभिक अनुमान में भूस्खलन से पैदा हुई गुरुत्वाकर्षण स्थितिज ऊर्जा करीब 51 किलोटन TNT के बराबर बताई गई, लेकिन उन्होंने खुद इस तुलना को सावधानी से देखने की बात कही है। भूस्खलन की ऊर्जा अलग तरीके से पैदा और स्थानांतरित होती है तथा उसका केवल एक छोटा हिस्सा भूकंपीय तरंगों में बदलता है।

धरती हिलने से वैज्ञानिक भी हुए हैरान

इस आपदा की एक और चौंकाने वाली बात यह रही कि अमेरिकी USGS के भूकंपीय उपकरणों ने ऐसी जमीन की हलचल दर्ज की, जिसे शुरुआती तौर पर भूकंप समझा गया था। बाद के विश्लेषण में संकेत मिले कि करीब 5.2 तीव्रता की जमीन की हलचल ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद हुए मलबा-प्रवाह से जुड़ी थी।यानी पहाड़ से भारी मात्रा में बर्फ और चट्टानों के अचानक नीचे आने ने इतनी शक्तिशाली हलचल पैदा की कि उसके संकेत भूकंपीय उपकरणों में दर्ज हुए।

क्या जलवायु परिवर्तन भी है वजह?

विशेषज्ञों ने इस घटना में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों की अस्थिरता को लेकर भी चिंता जताई है। काठमांडू विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख रिजन भक्त के मुताबिक, प्रभावित क्षेत्र में बहुत ज्यादा बारिश नहीं हुई थी, लेकिन पहाड़ों में तापमान काफी अधिक था। ज्यादा तापमान बर्फ के तेजी से पिघलने और ग्लेशियरों को अस्थिर करने में भूमिका निभा सकता है।हालांकि, किसी एक घटना को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। विशेषज्ञ अभी भी इस आपदा के पूरे कारणों और घटनाक्रम का अध्ययन कर रहे हैं।

चमोली हादसे से भी जुड़ती है घटना

नेपाल की यह घटना वर्ष 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुई आपदा की याद दिलाती है। उस घटना में भी पहाड़ से भारी मात्रा में बर्फ और चट्टान नीचे गिरी थी, जिसके बाद तेज मलबा-प्रवाह ने ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में भारी तबाही मचाई थी।नेपाल की मौजूदा आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन की जरूरत को सामने ला दिया है।

निष्कर्ष

नेपाल की यह बाढ़ हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती गंभीरता का एक बड़ा उदाहरण है। ग्लेशियर, चट्टान, पानी और ऊंचाई से गिरने वाली विशाल मात्रा ने मिलकर ऐसी ऊर्जा पैदा की, जिसके कारण धरती तक हिलने के संकेत दर्ज हुए।हिरोशिमा बम से ऊर्जा की तुलना फिलहाल विशेषज्ञों के आकलन पर आधारित है, इसलिए इसे अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष के बजाय एक विशेषज्ञ अनुमान के रूप में समझना चाहिए। लेकिन इतना स्पष्ट है कि नेपाल की यह आपदा असाधारण रूप से शक्तिशाली थी और हिमालयी क्षेत्रों में भविष्य की आपदा तैयारियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।

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