सीतापुर में सरकारी नजूल भूमि पर कार्रवाई का अभियान लगातार तेज होता जा रहा है। इसी क्रम में शहर के सिविल लाइंस स्थित ऐतिहासिक अशरफ मंजिल पर जिला प्रशासन ने सार्वजनिक नोटिस चस्पा कर दिया है। बताया जा रहा है कि इस बहुमूल्य संपत्ति की वर्तमान बाजार कीमत करीब 50 करोड़ रुपये आंकी गई है। प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद पूरे शहर में इस मामले की चर्चा तेज हो गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह कार्रवाई जिलाधिकारी न्यायालय के आदेश के बाद की गई है। प्रशासन ने नोटिस के माध्यम से वर्तमान कब्जेदारों और संभावित दावेदारों को 10 जुलाई तक अपना पक्ष और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। यदि तय समय सीमा के भीतर कोई वैध अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए जाते हैं, तो प्रशासन उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई करेगा।
राजस्व विभाग के अधिकारियों के अनुसार, अशरफ मंजिल जिस भूमि पर स्थित है, वह नजूल भूमि है। सरकारी अभिलेखों के मुताबिक वर्ष 1906 में इस भूमि का पट्टा जारी किया गया था। हालांकि, रिकॉर्ड की जांच में लंबे समय से पट्टे के नवीनीकरण का कोई प्रमाण नहीं मिला है। नजूल नियमों के अनुसार भवन निर्माण के लिए दिए गए ऐसे पट्टों की अधिकतम वैध अवधि 90 वर्ष होती है, जो काफी पहले समाप्त हो चुकी है। इसी आधार पर प्रशासन ने सार्वजनिक नोटिस जारी किया है।
प्रशासन का कहना है कि यदि संबंधित पक्ष समय पर संतोषजनक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाते हैं, तो इस भूमि को दोबारा राज्य सरकार के खाते में दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में इस जमीन का उपयोग जिला अस्पताल के विस्तार तथा अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए किया जा सकता है।
गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से सीतापुर प्रशासन नजूल भूमि से जुड़े मामलों की लगातार समीक्षा कर रहा है। शहर के कई अन्य स्थानों पर भी अवैध कब्जों और समाप्त हो चुके पट्टों की जांच की जा रही है। प्रशासन का उद्देश्य सरकारी संपत्तियों को सुरक्षित रखना और उनका उपयोग जनहित के कार्यों में सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।
इस कार्रवाई के बाद अशरफ मंजिल एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है। अब सभी की निगाहें 10 जुलाई पर टिकी हैं, जब संबंधित पक्ष अपना पक्ष प्रशासन के सामने रखेंगे। इसके बाद जिलाधिकारी न्यायालय उपलब्ध अभिलेखों और साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय लेगा। यदि दावा प्रमाणित नहीं होता है, तो करीब 50 करोड़ रुपये मूल्य की यह संपत्ति सरकारी कब्जे में आ सकती है।